संतान सप्तमी व्रत : संतति की रक्षा का पावन पर्व

संतान सप्तमी व्रत : मातृत्व की शक्ति और संतान सुख की साधना

हिन्दू धर्म में संतान को जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर माना गया है। माता-पिता का संपूर्ण जीवन उनकी संतान की खुशहाली, लंबी आयु और उज्ज्वल भविष्य की कामना में ही बीतता है। इन्हीं भावनाओं की अभिव्यक्ति का पावन अवसर है संतान सप्तमी व्रत, जिसे भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताएँ अपने बच्चों की रक्षा, दीर्घायु और कल्याण के लिए करती हैं।

🌞 पौराणिक आधार और महत्व

शास्त्रों में संतान सप्तमी का अत्यंत महत्व बताया गया है। स्कंदपुराण तथा पद्मपुराण में उल्लेख है कि –

“सप्तमी तिथौ यः स्त्री संतानार्थं व्रतं समाचरेत्।
तस्याः पुत्रः चिरंजीवी भवति सर्वसम्पदः॥”

अर्थात, जो स्त्री संतान सप्तमी व्रत करती है, उसकी संतान दीर्घायु, स्वस्थ और सम्पन्न होती है।

किंवदंती है कि प्राचीन काल में एक रानी ने वर्षों तक संतान के लिए यह व्रत किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें तेजस्वी पुत्र प्रदान किया। इसी प्रकार एक कथा में वर्णन आता है कि मृत्यु–संकट में फँसी संतान को माँ के इस व्रत ने पुनः जीवनदान दिया।

व्रत-विधि

  1. प्रातः स्नान और संकल्प – प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।
  2. पूजन सामग्री – सात दीपक, सात प्रकार के फल, सात प्रकार के अनाज, रोली, अक्षत, फूल, जल, दूर्वा आदि।
  3. देव पूजन
    • भगवान सूर्यदेव की पूजा करें, क्योंकि सप्तमी सूर्यदेव को समर्पित मानी जाती है।
    • माता पार्वती एवं भगवान शंकर जी तथा भगवान संतान गोपाल (श्रीकृष्ण) की आराधना करें।
  4. मंत्रजप – संतान गोपाल मंत्र का जप करें:
    • ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते।
      देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः॥
  5. व्रत कथा श्रवण – संतान सप्तमी व्रत कथा का श्रवण करें।
  6. संध्या आरती और व्रत समापन – संध्या को दीपदान करें और फलाहार से व्रत का पारायण करें।

विशेष पूजा-विधान : क्षीरसागर में चूड़ी/कड़ा पूजन

संतान सप्तमी के दिन केवल उपवास और कथा-श्रवण ही नहीं, बल्कि एक विशेष परंपरा भी निभाई जाती है।

  • इस दिन स्त्रियाँ चाँदी अथवा सोने का नया कड़ा/चूड़ी बनवाकर लाती हैं।
  • पूजा के समय एक स्वच्छ पात्र में दूध (क्षीर) भरकर उसमें वह चूड़ी/कड़ा डाला जाता है।
  • इस पात्र को क्षीरसागर मानकर भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी का स्मरण कर पूजन किया जाता है।
  • पूजा उपरांत वह चूड़ी/कड़ा स्त्री अपने दाएँ हाथ में धारण करती है।
  • यह चूड़ी/कड़ा पूरे एक वर्ष तक धारण किया जाता है।
  • अगले वर्ष संतान सप्तमी के दिन पुराना कड़ा उतारकर पुनः उसी विधि से नया कड़ा पूजित कर धारण किया जाता है।
  • इसी दिन लाल कच्चे सू़त्र (रक्त धागे) में सात गाँठें लगाकर उसे विशेष मंत्रों से पूजित किया जाता है।
  • यह सात गाँठों वाला धागा स्त्री अपने दाएँ हाथ में बाँधती है।
  • साथ ही यह धागा बच्चों के हाथ या गर्दन में भी बाँधा जाता है ताकि वे समस्त रोग-शोक से बचे रहें और उनकी आयु, बल और बुद्धि में वृद्धि हो।

महत्व

  • यह चूड़ी/कड़ा संतान की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।
  • इसे धारण करने से संतान पर आने वाले संकट दूर होते हैं।
  • माता के लिए यह मांगल्य-चिह्न और संतान के लिए आयु-वर्धक कवच माना गया है।
  • पुराना कड़ा उतारकर पुनः नया धारण करने की परंपरा जीवन-चक्र की निरंतरता और संतान की दीर्घायु का आशीर्वाद मानी जाती है।

🌺 संतान सप्तमी व्रत कथा

एक दिन महाराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से विनम्रतापूर्वक पूछा –

हे प्रभो! कृपया ऐसा उत्तम व्रत बताइए, जिससे मनुष्य सांसारिक क्लेशों से मुक्त होकर पुत्र–पौत्रवान हो सके और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त करे।

भगवान श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले –
“हे धर्मराज! ऐसा ही एक दिव्य व्रत है – संतान सप्तमी व्रत। इसका माहात्म्य असीम है। इस व्रत के प्रभाव से संतानहीन दंपत्ति भी संतान-सुख प्राप्त करते हैं और जिनके पुत्र-पौत्र होते हैं, उनकी रक्षा, उन्नति और दीर्घायु होती है।”

इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को एक पौराणिक कथा सुनाई और कहा –
यह कथा महर्षि लोमश ने स्वयं मेरी माता देवकी और पिता वसुदेव को बताई थी।

एक समय देवकी और वसुदेव कंस के अत्याचारों से पीड़ित होकर संतान-सुख से वंचित हो रहे थे। वे महर्षि लोमश से दुखी मन से बोले –

हे ऋषिवर! हमें कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे हमारी संतान की रक्षा हो सके और हमें पुत्र-पौत्र का सुख प्राप्त हो।

महर्षि लोमश ने करुणा भरे स्वर में कहा –
हे देवकी, हे वसुदेव! संतान सप्तमी का यह पावन व्रत यदि श्रद्धा और नियमपूर्वक किया जाए, तो संतान संबंधी सभी दुख दूर हो जाते हैं। इस व्रत से संतान निरोगी, दीर्घायु और कुल का गौरव बढ़ाने वाली होती है। यह व्रत मनुष्य को सांसारिक क्लेशों से मुक्त कर परम सुख प्रदान करता है।

इसके बाद लोमश ऋषि ने उन्हें एक प्राचीन कथा सुनाई।

अयोध्या नगरी में राजा नहुष राज्य करते थे। उनकी पत्नी का नाम रानी चंद्रमुखी था। उसी नगर में विष्णुगुप्त नामक एक ब्राह्मण रहता था, जिसकी पत्नी भद्रमुखी थी। रानी चंद्रमुखी और भद्रमुखी में बहन जैसा स्नेह था।

एक दिन दोनों सरयू नदी पर स्नान करने गईं। वहाँ उन्होंने कई स्त्रियों को बड़े श्रद्धाभाव से भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते देखा।

रानी चंद्रमुखी ने उत्सुकता से पूछा –
“बहनों! आप सब कौन-सा व्रत कर रही हैं?”

स्त्रियों ने उत्तर दिया –
“यह संतान सप्तमी व्रत है। जो भी इसे श्रद्धा और नियमपूर्वक करती है, उसे स्वस्थ, सुंदर और दीर्घायु संतान का सुख प्राप्त होता है।”

यह सुनकर रानी चंद्रमुखी और भद्रमुखी ने भी व्रत का संकल्प लिया।

भद्रमुखी ने नियमपूर्वक हर वर्ष संतान सप्तमी का व्रत किया, जबकि रानी चंद्रमुखी कभी करती, कभी भूल जाती।

समय बीता और दोनों का देहांत हो गया।

  • रानी चंद्रमुखी अगले जन्म में बंदरिया बनी।
  • भद्रमुखी मुर्गी के रूप में जन्मी।

मुर्गी बनी भद्रमुखी को अपने पिछले जन्म का व्रत याद रहा और वह निरंतर भगवान शिव का ध्यान करती रही।
परंतु बंदरिया बनी चंद्रमुखी सब भूल गई।

फिर अगले जन्म में –
भद्रमुखी एक ब्राह्मण कुल में भूषणदेवी के रूप में जन्मी। विवाह के बाद उसने निष्ठा से संतान सप्तमी का व्रत करना जारी रखा। व्रत के पुण्यफल से उसे आठ सुंदर, गुणी और स्वस्थ पुत्र प्राप्त हुए।

दूसरी ओर रानी चंद्रमुखी को व्रत की उपेक्षा का फल भोगना पड़ा। नए जन्म में उसे संतान का सुख नहीं मिला। बुढ़ापे में उसे एक पुत्र हुआ, लेकिन वह गूंगा, बहरा और कमजोर था। केवल नौ वर्ष की आयु में ही उसकी मृत्यु हो गई। रानी अत्यंत दुखी रहने लगी।

एक दिन भूषणदेवी अपने आठों पुत्रों के साथ रानी चंद्रमुखी से मिलने गई। रानी ने उनके सुख-समृद्ध जीवन और आठ पुत्रों को देखकर ईर्ष्या की और कपटवश विष मिले लड्डू उन्हें खिला दिए।

लेकिन भगवान शिव की कृपा से उन बच्चों को कोई हानि नहीं हुई। वे सब स्वस्थ रहे।

यह देखकर रानी चंद्रमुखी चकित और लज्जित हो गई। उसने भूषणदेवी से पूछा –
“बहन! यह कौन-सी शक्ति है जो तुम्हारे पुत्रों की रक्षा करती है?”

भूषणदेवी ने शांत स्वर में कहा –
“बहन! यह सब संतान सप्तमी व्रत का प्रभाव है। मैंने अपने दो जन्मों से यह व्रत कभी नहीं छोड़ा। भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा से मुझे यह संतान-सुख प्राप्त हुआ है।”

रानी को अपने पिछले जन्म की लापरवाही याद आई। वह पश्चाताप से भर गई।

रानी ने भूषणदेवी से क्षमा माँगी और संकल्प लिया कि अब वह पूरे नियम और श्रद्धा से संतान सप्तमी का व्रत करेगी।
कुछ ही समय में भगवान शिव की कृपा से उसे भी स्वस्थ और गुणी संतान प्राप्त हुई।

वह जीवन भर संतान-सुख और समृद्धि का आनंद भोगकर अंत में शिवलोक को प्राप्त हुई।

जो स्त्री श्रद्धा, भक्ति और नियम से संतान सप्तमी व्रत करती है, उसकी गोद कभी सूनी नहीं रहती।
उसे सुंदर, स्वस्थ और आज्ञाकारी संतान प्राप्त होती है तथा उसके परिवार में सदा सुख-समृद्धि का वास होता है।

व्रत से मिलने वाला फल

इस कथा के अनुसार, जो भी स्त्री संतान सप्तमी का व्रत श्रद्धापूर्वक करती है, उसकी संतान स्वस्थ, दीर्घायु और कष्टमुक्त होती है। यदि संतान पर कोई संकट आता है तो इस व्रत की शक्ति से वह संकट भी टल जाता है। संतान सुख से वंचित दंपत्ति को भी संतान की प्राप्ति होती है।

संतान सप्तमी व्रत का महत्व

  • संतान प्राप्ति में आने वाली बाधाएँ दूर होती हैं।
  • जन्मी संतान दीर्घायु, निरोगी और सौभाग्यशाली होती है।
  • संतान को अकाल मृत्यु और विपत्ति से रक्षा मिलती है।
  • माता के मातृत्व को आध्यात्मिक बल और दिव्य ऊर्जा प्राप्त होती है।

निष्कर्ष

संतान सप्तमी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मातृत्व की करुणा, ममता और त्याग का प्रतीक है। यह व्रत दर्शाता है कि संतान की रक्षा के लिए माता न केवल सांसारिक उपाय करती है, बल्कि ईश्वर की शरण में जाकर संतान के उज्ज्वल भविष्य का संकल्प भी लेती है।


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