क्या गुरुवार को माँ दुर्गा का विसर्जन करना अशुभ है?

जय माँ दुर्गे! विसर्जन का गूढ़ रहस्य: क्या शास्त्र गुरुवार को विसर्जन की अनुमति देते हैं?

नमस्कार, मैं हूँ आचार्य शिवम् !

प्रिय साधकों और धर्म जिज्ञासुओं! मैं आप सबका सादर अभिनंदन करता हूँ। हर वर्ष, शारदीय नवरात्रि के पावन पर्व की समाप्ति पर, एक प्रश्न मेरे पास बार-बार आता है, जो लाखों भक्तों के हृदय में दुविधा उत्पन्न करता है: “पंडित जी, क्या दुर्गा माता की मूर्ति का विसर्जन गुरुवार को करना शास्त्रसम्मत है? कहीं यह कोई अशुभ या दोषपूर्ण कार्य तो नहीं?”

यह प्रश्न सरल दिखता है, पर इसके भीतर हमारी सनातन परंपरा के दो महान स्तंभ— आगम-निगम (शास्त्र) और लोक-व्यवहार (जन-परंपरा)—के बीच का गहरा संबंध छिपा है। आज, मैं किसी सुनी-सुनाई बात के आधार पर नहीं, बल्कि साक्षात पुराणों, धर्मशास्त्रों और गूढ़ दार्शनिक सिद्धांतों के प्रकाश में इस विषय पर गहन विश्लेषण प्रस्तुत करूँगा।


विसर्जन की दार्शनिक आधारशिला—यह केवल मूर्ति का जल-प्रवाह नहीं है!

सबसे पहले, हमें यह समझना होगा कि मूर्ति पूजा और विसर्जन सिर्फ एक कर्मकांड नहीं है, बल्कि एक गहन आध्यात्मिक विज्ञान है।

💫 पंचतत्व का महासिद्धांत

आप जानते हैं कि हमारी माता प्रकृति, और स्वयं हमारा यह नश्वर शरीर, पंचतत्वों—क्षिति (पृथ्वी), जल (पानी), पावक (अग्नि), गगन (आकाश), और समीर (वायु)—से मिलकर बना है। विसर्जन का विधान इसी ब्रह्मांडीय चक्र पर आधारित है।

जब हम मिट्टी की प्रतिमा बनाते हैं और उसमें प्राण-प्रतिष्ठा करते हैं, तो हम उस निराकार, सर्वव्यापी ब्रह्म (दिव्य चेतना) को एक साकार माध्यम में आह्वान करते हैं। नौ दिन की पूजा से वह मूर्ति दिव्य ऊर्जा से ओत-प्रोत हो जाती है।

विसर्जन का अर्थ है: उस दिव्य चेतना को उसके मूल तत्व—जल—में सहर्ष वापस लौटाना। जल को स्वयं नारायण का स्वरूप और वरुण देव का क्षेत्र माना गया है। अतः, यह विसर्जन किसी ‘त्याग’ या ‘अशुभ’ कर्म का प्रतीक नहीं है, बल्कि ‘पूर्णता’ और ‘ब्रह्मांडीय वापसी’ का परम पवित्र कृत्य है। यह क्रिया, अपने आप में, किसी भी वार (दिन) के निषेध से ऊपर है।

शास्त्रीय विधान क्या कहता है?—दिन (वार) महत्वपूर्ण या तिथि (Tithi)?

अब, हम सीधे शास्त्र की बात करते हैं। क्या हमारे पुराणों में कहीं ऐसा स्पष्ट निर्देश है कि ‘गुरुवार को विसर्जन न किया जाए’?

पुराणों का स्पष्ट उद्घोष: तिथि ही सर्वोपरि!

मेरे प्रिय भक्तों, मैंने शिव महापुराण, श्रीमद् देवी भागवत महापुराण, और संबंधित स्मृतियों का गहन अध्ययन किया है। आप जान लें:

  1. सर्वोपरि विधान तिथि का है: हमारे शास्त्र वार (दिन) पर नहीं, बल्कि तिथि (tithi) पर केंद्रित हैं।
  2. दशमी तिथि ही विसर्जन का काल है: शिव महापुराण में स्पष्ट है कि देवी दुर्गा ने दशमी तिथि को महिषासुर का वध किया और इसी दिन वह कैलाश पर्वत पर अपने लोक को लौट गईं।
  3. इसलिए, विसर्जन के लिए जो सबसे शुभ और शास्त्र-निर्दिष्ट काल है, वह है विजयादशमी (दशमी) की तिथि।

शिव महापुराण में कहा गया है—

“पृथिव्यापस्तथा तेजो वायु: खं च महाद्भुतम्।
एतेषु लीयते सर्वं पुन: सृष्टिर्भविष्यति॥”

अर्थात्, अंत में सब कुछ पंचतत्व में विलीन होकर पुनः सृष्टि का कारण बनता है।

विसर्जन का उद्देश्य एवं कालिका पुराण का निर्देश

विसर्जन का अर्थ मात्र मूर्ति को जल में प्रवाहित करना नहीं है। इसका गूढ़ अर्थ है—दिव्य शक्ति का पुन: उनके निराकार स्वरूप में लौटना। कालिका पुराण इस समापन के लिए एक स्पष्ट समय निर्धारित करता है:

अपराह्णे दशम्यां तु कुर्याद्देव्याः समापनम्। (कालिका पुराण 67/20) अर्थात्: दशमी तिथि के अपराह्ण काल (दोपहर बाद, प्रदोषकाल से पूर्व) में देवी का विसर्जन किया जाना चाहिए।

यह श्लोक विसर्जन के लिए केवल दशमी तिथि और उसके समय (अपराह्ण) को ही आधार मानता है, किसी भी वार (दिन) के निषेध का उल्लेख नहीं करता।

देवीभागवत पुराण का समर्थन

विसर्जन की श्रेष्ठता को स्थापित करते हुए देवीभागवत पुराण स्पष्ट करता है कि दशमी तिथि ही इस कार्य के लिए सर्वश्रेष्ठ है:

नवमीदिने विसर्जयेत्, दशम्यां वा विशेषतः। (देवीभागवत पुराण 7/39/28-30) अर्थात्: नवमी को भी विसर्जन संभव है, परन्तु मुख्य रूप से विजयादशमी (दशमी) को ही करना सबसे श्रेष्ठ है।

निर्णयसिन्धु (दुर्गापूजा-प्रकरणम्) भी इसी बात का समर्थन करता है कि दशमी तिथि के दिन, विशेषकर अपराह्ण में विसर्जन का विधान है।

शास्त्र

उपर्युक्त प्रमाणों से यह अकाट्य रूप से सिद्ध होता है कि विसर्जन के लिए तिथि (दशमी) ही सर्वोपरि है। यदि शुभ दशमी तिथि को गुरुवार पड़ रहा हो, तो भी कालिका पुराण के निर्देशानुसार विसर्जन करना पूर्णतः शास्त्रसम्मत है और इसमें किसी प्रकार का कोई दोष नहीं है। शास्त्र तिथि को महत्व देते हैं, वार को नहीं। यदि हमें तिथि की उपेक्षा करके केवल वार को देखना पड़े, तो यह स्वयं में धर्म का उल्लंघन होगा।

याद रखें: जिन दुर्गा सप्तशती या देवी भागवत जैसे ग्रंथों में पूजा के विस्तृत नियम हैं, उनमें विसर्जन के लिए किसी विशिष्ट दिन-आधारित निषेध (prohibition) का पूर्ण अभाव है। यह अभाव ही प्रमाण है कि यह नियम शास्त्रीय नहीं है।

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लोक-परंपरा की भूमिका—बेटी की विदाई का भावनात्मक संबंध

तो, फिर यह मान्यता कहाँ से आई? यदि शास्त्र में निषेध नहीं है, तो समाज में इतनी गहराई से यह बात क्यों जड़ जमा चुकी है?

इसका उत्तर हमारी लोक-परंपरा (Lok Paramparaa) और हमारी सांस्कृतिक भावनाओं में छिपा है।

बेटी की विदाई और गुरुवार का निषेध

लोक-आस्था में, माँ दुर्गा नौ दिनों के लिए पृथ्वी पर हमारे मायके (Maika) में आती हैं। विजयादशमी को उनका कैलाश (ससुराल) लौटना एक बेटी की विदाई (Bidai) के समान माना जाता है। इस भावनात्मक समानता ने विसर्जन को केवल पूजा नहीं, बल्कि एक पारिवारिक संस्कार बना दिया है।

हमारी सनातन संस्कृति में, बेटी को साक्षात लक्ष्मी का स्वरूप माना जाता है। लोक-रीतियों और मान्यताओं के अनुसार:

  1. गुरुवार को अशुभ माना जाता है: लोक-परंपरा में, मंगलवार, गुरुवार और रविवार को बेटी या बहू की विदाई (ससुराल भेजना) अशुभ मानी जाती है।
  2. लक्ष्मी का प्रस्थान: चूँकि गुरुवार देवगुरु बृहस्पति और भगवान विष्णु का दिन है, जो समृद्धि और सौभाग्य के कारक हैं, यह माना जाता है कि इस दिन लक्ष्मी-स्वरूपा (बेटी/देवी) को घर से विदा करना शुभ नहीं है। यह डर रहता है कि इससे घर में दरिद्रता (गरीबी) आ सकती है—’घर खाली’ हो सकता है।
  3. भावनात्मक तार: यह निषेध शास्त्र से नहीं, बल्कि भक्तों के हृदय की गहन भावना से उत्पन्न हुआ है। भक्त चाहते हैं कि उनकी बेटी (माँ दुर्गा) जिस दिन विदा हों, वह दिन कहीं से भी उनके लिए अशुभ न हो।

यही सांस्कृतिक और भावनात्मक तर्क ही गुरुवार को विसर्जन न करने की लोक-मान्यता का वास्तविक आधार है।

सार-संक्षेप और आचार्य का अंतिम निर्णय

शास्त्रीय और लोक-मान्यता का अंतर

आपके लिए इस पूरी चर्चा का सार समझना आवश्यक है:

पहलूशास्त्रीय (शास्त्रसम्मत) परिप्रेक्ष्यलोक-परंपरा (लोक-आचरण) परिप्रेक्ष्य
प्राथमिक आधारपुराण, धर्मशास्त्र, स्मृतियाँ (परम सत्य)मौखिक परंपरा, रीति-रिवाज, ज्योतिषीय मान्यताएँ (मानवीय भावना)
नियमदशमी तिथि पर विसर्जन, किसी दिन (वार) का निषेध नहीं।बेटी की विदाई के तर्क पर गुरुवार को विसर्जन का निषेध।
तर्कपंचतत्व में विलीन होना (ब्रह्मांडीय विज्ञान)।लक्ष्मी-स्वरूपा का गुरुवार को प्रस्थान अशुभ (सांस्कृतिक भावना)।
प्रमाणगुरुवार निषेध का कोई श्लोक नहीं।सामाजिक और भावनात्मक रूप से गहरी जड़ वाली मान्यता।

अंतिम निर्णय (Final Verdict)

प्रिय भक्तों, मेरा स्पष्ट मत और निर्देश है:

  1. धर्म का आधार शास्त्र है: यदि दशमी तिथि को गुरुवार पड़ता है, तो शास्त्रों के अनुसार विसर्जन करना पूर्णतः वैध और दोषमुक्त है। आप बिना किसी संकोच के विसर्जन कर सकते हैं।
  2. लोक-आस्था का सम्मान करें: यदि आपका हृदय या आपके परिवार की स्थानीय परंपरा आपको गुरुवार को विसर्जन करने की अनुमति नहीं देती है, तो आप एकादशी (दशमी के बाद की तिथि) को विसर्जन कर सकते हैं। यह भी शास्त्रसम्मत है, क्योंकि एकादशी के दिन भी देवी की पूजा और विसर्जन का विधान कुछ ग्रंथों में मिलता है।
  3. भावना सर्वोपरि: धर्मशास्त्र लचीले होते हैं। यदि आपके हृदय की शुद्ध भावना किसी कार्य को करने से रोकती है, तो उस भावना का सम्मान करें। परंतु इस बात का ध्यान रखें कि यह नियम शास्त्रीय अनिवार्यता नहीं, बल्कि भावनात्मक सावधानी है।

तो, भाइयों-बहनों, निष्कर्ष स्पष्ट है—

  • शास्त्र का विधान: विसर्जन दशमी को ही हो। किसी वार का निषेध शास्त्रों में नहीं है।
  • लोक परंपरा की मान्यता: गुरुवार को विसर्जन न करें, क्योंकि यह बेटी की विदाई के समान है और गुरुवार को विदाई अशुभ मानी जाती है।

अंततः—

श्रद्धया देवि सम्पूज्या श्रद्धया विसृजेत्तु ताम्।
श्रद्धया सर्वकार्याणि सिद्ध्यन्ति नात्र संशयः॥

(देवी भागवत)

अर्थात्—माता को श्रद्धा से पूजना और श्रद्धा से विसर्जन करना ही सबसे बड़ा नियम है।

आप निश्चिंत रहें। माँ जगदम्बा केवल आपके हृदय के भाव को देखती हैं। विसर्जन की तिथि या वार से अधिक महत्वपूर्ण है कि आपने कितने प्रेम, श्रद्धा और विधि-विधान से उनकी पूजा की है।

जय माता दी!

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