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वैदिक कर्मकाण्ड में पूजा-पाठ के दौरान हस्त-स्वर के प्रयोग को लेकर शास्त्रों में बहुत ही स्पष्ट और तकनीकी निर्देश दिए गए हैं। इसका उत्तर इस बात पर निर्भर करता है कि आप मन्त्रों का प्रयोग किस उद्देश्य (स्वाध्याय या अनुष्ठान) के लिए कर रहे हैं:
1. कर्मकाण्ड (पूजा-पाठ, जप और होम) में: वर्जित/अनिवार्य नहीं
शास्त्रीय नियमों के अनुसार, जब आप प्रत्यक्ष रूप से कोई अनुष्ठान, जप या हवन कर रहे होते हैं, तो हस्त-स्वर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके लिए ‘आह्निक सूत्र‘ और ‘याज्ञवल्क्य शिक्षा‘ में एक विशेष निर्देश दिया गया है:
“उपस्थाने जपे होमे दोहे च यज्ञ कर्मणी। हस्त स्वरं न कुर्वीत शेषास्तु स्वर संयुता॥“
अर्थात् उपस्थान (देवता के सम्मुख स्तुति), जप, होम (हवन), गोदोहन और यज्ञीय कार्यों के समय हस्त-स्वर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इन क्रियाओं में केवल ‘कण्ठ-स्वर’ (वाणी का उतार-चढ़ाव) पर्याप्त माना जाता है। इसके पीछे व्यावहारिक कारण यह भी है कि पूजा के समय हाथ अन्य क्रियाओं (जैसे आहुति देना, मुद्राएं बनाना या जल चढ़ाना) में व्यस्त होते हैं।
2. स्वाध्याय (सीखने और अभ्यास) में: अनिवार्य
यदि आप मन्त्रों को याद कर रहे हैं, उनका अभ्यास कर रहे हैं या गुरु से शिक्षा ले रहे हैं, तो हस्त-स्वर का प्रयोग पूर्णतः अनिवार्य है। शिक्षा ग्रन्थों के अनुसार:
- बिना हस्त-स्वर के वेद पाठ करने वाला व्यक्ति मन्त्रों की शक्ति का पूर्ण लाभ नहीं ले पाता और इसे ‘दोषपूर्ण पाठ’ माना जाता है。
- हस्त-स्वर यह सुनिश्चित करते हैं कि आपकी वाणी और स्वर (उदात्त, अनुदात्त, स्वरित) में कोई त्रुटि न हो।
निष्कर्ष:
- सामान्य पूजा-पाठ/हवन/जप: हस्त-स्वर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। यहाँ केवल शुद्ध उच्चारण और कण्ठ-स्वर का ध्यान रखें।
- वेदाध्ययन/पाठ अभ्यास: हस्त-स्वर का प्रयोग अनिवार्य है ताकि मन्त्रों की शुद्धता बनी रहे।
- अपवाद: कुछ विशेष परिस्थितियों और गुरु-परम्पराओं (जैसे वाराणसी की कुछ शाखाओं) में अनुष्ठान के दौरान भी सूक्ष्म हस्त-संचालन देखा जाता है, लेकिन सामान्य नियम ऊपर वर्णित ‘उपस्थाने जपे होमे…’ सूत्र ही है।




